IJMRR - International Journal of Multidisciplinary Research & Reviews
Int. J. Multidiscip. Res. Rev.
DOI Prefix: 10.56815
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Peer Reviewed | Multidisciplinary | UGC Aligned | C | O | P | E Ethical Standard

ISSN: 2945-3135 | Digital Archiving | CrossRef Member
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Vol. 5 (2026) No. 9: September (2026)

[17] चोलयुगीन मुद्राओं का सामाजिक एवं आर्थिक प्रभाव

डॉ. अंजना वर्मा


दशवीं शती के प्रारंभिक वर्षों में प्रायद्वीपीय सुदूर दक्षिण भारत में कई शक्तिशाली एवं महत्वपूर्ण शक्तियों का उदय हुआ। यह राजवंश अपनी सामाजिक एवं सांस्कृतिक उपलब्धियों के कारण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। यह राज्य पेननार व वेल्लारू नदियों के मध्य स्थित था। यह क्षेत्र पूर्वी समुद्र तट से जुड़ा हुआ था। कावेरीपट्टनम्, उरैयूर, तंजौर, कांची, गंगैकोंडचोलपुरम् आदि नगर विशेष रूप से उल्लेखनीय व क्रमशः चोलों की राजधानी थे।¹ चोल साम्राज्य अपनी उत्कृष्ट प्रशासनिक व्यवस्था, नौसैनिक शक्ति, सुदृढ़ अर्थव्यवस्था एवं मंदिर स्थापत्य के लिए प्रसिद्ध है। चोल शासकों ने स्वर्ण, रजत व ताम्र धातुओं की मुद्राओं का प्रचलन किया, जिसने वस्तु विनिमय की प्रणाली को मौद्रिक अर्थव्यवस्था में परिवर्तित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। राजराज प्रथम एवं राजेन्द्र प्रथम की अनेक महत्वपूर्ण विजयों के कारण चोल युग में मौद्रिक अर्थव्यवस्था का विशेष रूप से विकास हुआ। चोल युगीन मुद्राएं न केवल राजकीय कर संग्रह का साधन थी अपितु मंदिरों, स्थानीय संस्थाओं और बाह्य देशों में व्यापार करने वाले श्रेणियों के मध्य वित्तीय लेन-देन का प्रमुख माध्यम थी। चोल शासकों ने स्वर्ण, रजत एवं ताम्र धातुओं की मुद्राएँ प्रचलित किये। इन मुद्राओं का वजन एवं शुद्धता अत्यंत सटीक होती थी, जो तद्यूगीन वित्तीय स्थिरता और धातु विज्ञान की उन्नत समझ का प्रमाण है। ‘कलंजु’, स्वर्ण धातु का प्रमुख मानक सिक्का था।² ‘माडे’, उच्च वर्ग की स्वर्ण मुद्रा थी। यह सिक्का बड़े पैमाने पर भूमि क्रय-विक्रय, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, विशेष राजकीय अवसरों एवं मंदिरों में स्थायी अक्षय निधि हेतु प्रयोग में आते थे। राजेन्द्र चोल ने गंगैकोंडचोलपुरम् माडे निर्गत किया था। ‘कासु’ नामक मुद्रा स्वर्ण, चांदी व ताम्र धातु से निर्मित थी। यह सामान्य जन में सबसे अधिक प्रचलित मुद्रा थी।³ इसके अतिरिक्त ‘पोन’ स्वर्ण धातु का तथा ‘अक्कम’ ताम्र धातु की मुद्रा थी। पोन व्यावसायिक श्रेणियों के मध्य वित्तीय लेन-देन में तथा अक्कम दैनिक आवश्यकताओं को पूर्ण करने में प्रयोग किया जाता था। इन मुद्राओं के मुख भाग पर चोलों के राजकीय चिन्ह व्याघ्र का अंकन होता था तथा दूसरी तरफ बैठी हुई आकृति के साथ राजा का नाम एवं उपाधियाँ होती थीं।