[ 19 ] छायावादी कविता की अवधारणा एवं हिन्दी आलोचना : एक अध्ययन

पेपर की जानकारी : प्रस्तुत करने की तिथि: Sep 16, 2025, पुनरीक्षण की तिथि: Oct 09, 2025, स्वीकार करने की तिथि: Oct 15, 2025, डी.ओ.आई. : https://doi.org/10.56815/ijmrr.v4i3.2025.220-224, कैसे उद्धृत करें: सुरेश कुमार (2025). छायावादी कविता की अवधारणा एवं हिन्दी आलोचना : एक अध्ययन. इंटरनेशनल जर्नल ऑफ मल्टीडिसिप्लिनरी रिसर्च एंड रिव्यूज, 4 (3) 220-224.

Authors

  • डॉ० सुरेश कुमार एसोसिएट प्रोफेसर हिंदी, राजकीय महाविद्यालय पिहानी हरदोई (उत्तर प्रदेश), भारत।

Abstract

हिन्दी कविता के क्षेत्र में प्रथम महायुद्ध के आस-पास एक विशेष काव्यधारा का प्रवर्तन हुआ, जिसे छायावाद की संज्ञा दी गई है। छायावाद विशेष रूप से हिन्दी साहित्य के ‘रोमांटिक उत्थान’ की वह काव्यधारा है जो लगभग ई० सन् 1918 से 1936 (उच्छवास से युगान्त) तक की प्रमुख युगवाणी रही, जिसमें प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी प्रमुख कवि हुए और सामान्य रूप से भावोच्छ्वास प्रेरित स्वच्छन्द कल्पना वैभव की वह स्वच्छन्द प्रवृत्ति है। जब तक किसी प्राचीनतर सामग्री का पता नहीं चलता इसी को छायावाद का सर्वप्रथम निबन्ध कहा जा सकता है।

प्रणयवासना का यह उद्घार आध्यात्मिक पर्दे में ही छिपा न रह सका। हृदय की सारी भावनाएँ इन्द्रियों के सुखविलास की मधुर और रमणीय सामग्री के बीच एक बँधी हुई रुचि पर व्यक्त होने लगी। इस प्रकार रहस्यवाद से सम्बन्ध न रखने वाली कविताएँ भी छायावादी कही जाने लगीं। अतः छायावाद शब्द का प्रयोग रहस्यवाद तक ही न रहकर काव्यशैली के सम्बन्ध में भी प्रतीकवाद के अर्थ में होने लगा।

Keywords:

इदमिथम् , छायावादी, स्वाभाविकता, सौन्दर्यानुभूति, सुलझाना, रीतिकालीन, काव्यात्मक, गतिशीलता, प्रतिक्रिया।

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