[ पेपर आई.डी. : 67007 ] भारत–जापान सम्बन्धों के मध्य वैश्विक व सामाजिक साझेदारी का एक अध्ययन
पेपर की जानकारी : प्रस्तुत करने की तिथि: Oct 21, 2025, पुनरीक्षण की तिथि: Nov 15, 2025, स्वीकार करने की तिथि: Nov 28, 2025, डी.ओ.आई. : https://doi.org/10.56815/ijmrr.v5i1.2026.68-72, कैसे उद्धृत करें: दीपेन्द्र सिंह तोपवाल (2026). भारत–जापान सम्बन्धों के मध्य वैश्विक व सामाजिक साझेदारी का एक अध्ययन. इंटरनेशनल जर्नल ऑफ मल्टीडिसिप्लिनरी रिसर्च एंड रिव्यूज, 5 (1) 68-72
Abstract
भारत–जापान सम्बन्धों के मध्य वैश्विक व सामाजिक साझेदारी का एक अध्ययन भारत और जापान के बीच की मित्रता सदियों पुरानी है, जिसकी नींव बौद्ध धर्म के प्रसार के साथ रखी गई थी। दोनों देश अपनी वैश्विक व सामाजिक साझेदारी को मज़बूत करने के लिए निरंतर प्रयासरत रहे हैं। आधुनिक युग में यह सम्बन्ध केवल सांस्कृतिक आदान–प्रदान तक सीमित नहीं रहे, बल्कि एक व्यापक वैश्विक रणनीति और वैश्विक साझेदारी में बदल गये हैं। भारत–जापान के मध्य आपसी सम्बन्ध अत्यन्त मैत्रीपूर्ण रहे हैं। इन सम्बन्धों की जड़ें धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रही हैं, जिसके परिणामस्वरूप दोनों देशों के बीच सम्बन्धों में निरन्तर विकास होता रहा है। जो सतत विकास के माध्यम से शान्ति, स्थिरता और आपसी सहयोग पर केन्द्रित है। उनकी साझेदारी साझा लोकतांत्रिक मूल्यों, बहुलवाद, खुले समाज और कानून के शासन पर आधारित है। यह राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक हितों के गहरे समन्वय को दर्शाती है। दोनों देश वैश्विक और क्षेत्रीय चुनौतियों का समाधान करने में एक-दूसरे को सक्षम भागीदार के रूप में देखते हैं।
उल्लेखनीय है कि राजनीतिक सम्बन्धों के पहले दशक में भारत और जापान ने महत्वपूर्ण उच्च स्तरीय आदान–प्रदान किये जिसमें 1957 में जापानी प्रधानमंत्री नोबुसुके किशी का भारत आगमन और उसी वर्ष प्रधानमंत्री नेहरू की टोक्यो यात्रा शामिल थी। बाद के दशकों में यात्राएँ थोड़ी धीमी हो गईं और 1980 के दशक तक कम उच्च स्तरीय यात्राएँ हुईं। हालांकि 1980 के दशक में जापान के सहयोग से भारत में मारुति–सुजुकी कार कम्पनी की स्थापना की गई। साथ ही भारत की सबसे अधिक सरकारी विकास सहायता (Official Development Assistance – ODA) जापान से ही प्राप्त हुई है। इसके अलावा भारत में बुनियादी सुविधाओं के विकास जैसे दिल्ली मेट्रो परियोजना तथा बुलेट ट्रेन के विकास में भी जापान का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
भारत व जापान के बीच 1952 में कूटनीतिक सम्बन्धों की स्थापना के बाद से ही सम्बन्धों का विस्तार होता रहा है। वर्तमान में जापान, चीन व भारत के बाद एशिया की तीसरी तथा विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। जापान भारत के लिए आर्थिक सहायता तथा आधुनिक तकनीकी का एक महत्वपूर्ण स्रोत रहा है। यद्यपि शीत युद्ध काल में जापान सामरिक रूप से अमेरिका व एशियाई देशों के गुट के करीब रहा है, लेकिन भारत के साथ जापान की आर्थिक व विकास साझेदारी में कोई कमी नहीं आई। उत्तर–शीत युद्ध काल में भारत द्वारा किए गए आर्थिक सुधारों के बाद दोनों देशों की नीतियों के कारण व्यापार और सामाजिक सहयोग के अवसर बढ़े। दोनों देशों ने व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते को भी लागू किया।
चीन की सामरिक चुनौतियों का सामना करने के लिए दोनों देशों के बीच एक साझा सामरिक दृष्टिकोण विकसित हुआ है। इसके अन्तर्गत दोनों देशों ने हिन्द–प्रशान्त क्षेत्र को मुक्त, स्वतंत्र तथा नियम–आधारित व्यवस्था की स्थापना के पक्ष में समर्थन दिया है। इसके लिए दोनों देशों ने अमेरिका तथा ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर क्वाड नामक सामरिक सहयोग मंच की स्थापना की है। वास्तव में हिन्द–प्रशान्त क्षेत्र में इस प्रकार के सामरिक मंच की स्थापना का विचार सबसे पहले 2007 में जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने दिया था।
स्मरणीय है कि द्वितीय विश्व युद्ध से हुए नुकसान के बावजूद जापान ने तेजी से अपना आर्थिक विकास किया। वर्ष 2010 तक चीन के उदय से पूर्व जापान लंबे समय तक अमेरिका के बाद विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था रहा है। इसके बाद जर्मनी व भारत के आगे जाने के बाद इस समय जापान विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी तथा एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। भारत व जापान के साथ अपने सम्बन्धों को कितना महत्व देता है इसका प्रमाण इस बात से भी चलता है कि चीन के बाद जापान ही एकमात्र ऐसा देश है जिसके साथ भारत प्रति वर्ष शिखर सम्मेलनों के आयोजन की व्यवस्था करता है। दोनों देशों के बीच पहला शिखर सम्मेलन 2006 में आयोजित किया गया था। तब से लेकर अब तक दोनों देश निरंतर इन शिखर सम्मेलनों का आयोजन कर रहे हैं। ये शिखर सम्मेलन लगभग हर वर्ष आयोजित किए जाते हैं। ये शिखर सम्मेलन दोनों देशों के बीच उच्च–स्तरीय कूटनीतिक व सामरिक विचार–विमर्श के महत्वपूर्ण साधन हैं।













