[ पेपर आई.डी. : 58316 ] औपनिवेशिक काल के दौरान भारतीय कृषि और पारंपरिक उद्योगों का पतन: एक ऐतिहासिक विश्लेषण

पेपर की जानकारी : प्रस्तुत करने की तिथि: Dec 26, 2025, पुनरीक्षण की तिथि: Jan 21, 2026, स्वीकार करने की तिथि: Jan 29, 2026, डी.ओ.आई. : https://doi.org/10.56815/ijmrr.v5i1.2026.211-222, कैसे उद्धृत करें: Preeti Kumari (2026). औपनिवेशिक काल के दौरान भारतीय कृषि और पारंपरिक उद्योगों का पतन: एक ऐतिहासिक विश्लेषण. इंटरनेशनल जर्नल ऑफ मल्टीडिसिप्लिनरी रिसर्च एंड रिव्यूज, 5 (1) 211-222

Authors

  • Preeti Kumari* Research Scholar, Department of History, Malwanchal University, Indore, M.P. India.

Abstract

यह शोध पत्र ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के अधीन भारतीय अर्थव्यवस्था के दो प्रमुख स्तंभों कृषि और पारंपरिक हस्तशिल्प के ह्रास की प्रक्रिया और उसके कारणों का समालोचनात्मक विश्लेषण करता है शोध का मुख्य केंद्र बिंदु यह पड़ताल करना है कि किस प्रकार ईस्ट इंडिया कंपनी और तत्पश्चात ब्रिटिश क्राउन की आर्थिक नीतियों ने भारत की सदियों पुरानी आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक 'औपनिवेशिक उपभोज्य अर्थव्यवस्था'  में परिवर्तित कर दिया। कृषि के संदर्भ में, यह पत्र नई भू-राजस्व प्रणालियों (जैसे स्थायी बंदोबस्त और रैयतवारी) और कृषि के जबरन वाणिज्यिकरण के दुष्प्रभावों को रेखांकित करता है, जिसने कृषकों को ऋणग्रस्तता और अकाल की ओर धकेला। दूसरी ओर, पारंपरिक उद्योगों के क्षेत्र में, यह शोध 'वि-औद्योगिकीकरण' की प्रक्रिया का परीक्षण करता है, जहाँ ब्रिटिश मशीनी उत्पादों की प्रतिस्पर्धा और विभेदात्मक टैरिफ नीतियों ने भारतीय वस्त्र और धातु उद्योगों को नष्ट कर दिया अध्ययन के निष्कर्ष दर्शाते हैं कि कृषि और उद्योगों का यह पतन केवल आर्थिक परिवर्तन नहीं था, बल्कि एक सुनियोजित 'धन का निष्कासन' था, जिसने भारतीय सामाजिक-आर्थिक ढांचे में संरचनात्मक विकृतियाँ पैदा कीं  यह शोध प्राथमिक और माध्यमिक ऐतिहासिक स्रोतों के आधार पर यह तर्क प्रस्तुत करता है कि औपनिवेशिक नीतियों ने आधुनिक भारतीय आर्थिक पिछड़ेपन की नींव रखी।

Keywords:

औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था, वि-औद्योगिकीकरण, भू-राजस्व, कृषि का वाणिज्यिकरण, धन का निष्कासन, ब्रिटिश राज।

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