[17] डिजिटल उपवास: शहरी युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक व्यवहार पर एक समाजशास्त्रीय अध्ययन

पेपर की जानकारी : प्रस्तुत करने की तिथि: Jan 17, 2026, पुनरीक्षण की तिथि: Feb 08, 2026, स्वीकार करने की तिथि: Feb 16, 2026, डी.ओ.आई. : https://doi.org/10.56815/ijmrr.v5i2.2026.148-165, कैसे उद्धृत करें: विनय कुमार सिन्हा (2026). डिजिटल उपवास: शहरी युवाओं के मानससक स्वास््य और सामाजिक व्यवहार पर एक समािशास्रीय अध्ययन. इंटरनेशनल जर्नल ऑफ मल्टीडिसिप्लिनरी रिसर्च एंड रिव्यूज, 5(2), 148-165.

Authors

  • डा० विनय कुमार सिन्हा असिस्टेंट प्रोफेसर, समाजशास्त्र विभाग, राजेन्द्र मिश्रा महाविद्यालय, सहरसा, बिहार, भारत

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https://doi.org/10.56815/ijmrr.v5i2.2026.148-165

Abstract

प्रस्तुत शोध पत्र समकालीन डिजिटल युग में 'डिजिटल उपवास' (Digital Detox) की बढ़ती प्रासंगिक अवधारणा और इसके सामाजिक-मानसिक प्रभावों का विश्लेषण करता है। सूचना क्रांति के इस दौर में स्मार्टफोन और सोशल मीडिया की अति-निर्भरता ने शहरी युवाओं के बीच 'हाइपर-कनेक्टिविटी' को जन्म दिया है, जिसके परिणामस्वरूप तनाव, अनिद्रा और FOMO (छूट जाने का डर) जैसी समस्याएँ उभरी हैं। इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि तकनीकी उपकरणों से स्वेच्छा से बनाई गई दूरी युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य और उनके वास्तविक सामाजिक संबंधों को किस प्रकार प्रभावित करती है। शोध में प्राथमिक और द्वितीयक डेटा का उपयोग करते हुए यह देखा गया है कि डिजिटल उपवास न केवल मानसिक थकान को कम करने में सहायक है, बल्कि यह व्यक्ति को अपने भौतिक परिवेश और परिवार के साथ पुनः जुड़ने का अवसर प्रदान करता है। अध्ययन के निष्कर्ष यह दर्शाते हैं कि यद्यपि डिजिटल उपवास के शुरुआती चरणों में युवाओं में 'विंड्रॉल सिम्पटम्स' (बेचैनी) देखे जाते हैं, परंतु दीर्घकालिक रूप से यह एकाग्रता बढ़ाने और सामाजिक अलगाव (Social Alienation) को कम करने में प्रभावी सिद्ध होता है। यह शोध अंततः 'डिजिटल मिनिमलिज्म' और तकनीक के सचेत उपयोग की आवश्यकता पर बल देता है।

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