[1] प्राचीन भारतीय संघ व्यवस्था में महिलाओं की स्थिति: बौद्ध ‘भिक्षुणी संघ’ एवं जैन ‘आर्यिका संघ’ का एक तुलनात्मक ऐतिहासिक शोध

Kirti Kumari (2026). प्राचीन भारतीय संघ व्यवस्था में महिलाओं की स्थिति: बौद्ध ‘भिक्षुणी संघ’ एवं जैन ‘आर्यिका संघ’ का एक तुलनात्मक ऐतिहासिक शोध. International Journal of Multidisciplinary Research & Reviews, 5(5), 1–20

Authors

  • Dr. Kirti Kumari Department of History, Ph.D From Malwanchal University, Indore, M.P, India.

Abstract

प्रस्तुत शोध पत्र छठी शताब्दी ईसा पूर्व की सामाजिक-धार्मिक क्रांति के आलोक में बौद्ध एवं जैन धर्मों द्वारा स्थापित महिला संघों का एक तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। प्राचीन भारतीय इतिहास के उस कालखंड में, जहाँ सामाजिक संरचनाएँ मुख्य रूप से पितृसत्तात्मक और ब्राह्मणवादी व्यवस्था से प्रभावित थीं, बौद्ध ‘भिक्षुणी संघ’ और जैन ‘आर्यिका संघ’ ने महिलाओं को एक स्वतंत्र धार्मिक एवं आध्यात्मिक मंच प्रदान किया। इस शोध का मुख्य केंद्र बिंदु दोनों संघों की स्थापना, उनके संगठनात्मक ढाँचे, और महिलाओं के लिए निर्धारित ‘विनय’ (नियमों) का तुलनात्मक अध्ययन करना है। जहाँ बौद्ध धर्म में बुद्ध ने महाप्रजापति गौतमी के आग्रह पर ‘अष्ट गरुधम्म’ की कठोर शर्तों के साथ भिक्षुणी संघ की अनुमति दी, वहीं जैन धर्म में भगवान महावीर के समय से ही ‘चतुर्विध संघ’ में आर्यिकाओं (साध्वियों) का महत्वपूर्ण स्थान रहा। शोध पत्र के अंतर्गत ‘थेरिगाथा’ और जैन आगमों जैसे प्राथमिक स्रोतों के आधार पर यह विश्लेषण किया गया है कि इन संघों ने महिलाओं को न केवल मोक्ष या निर्वाण का मार्ग दिखाया, बल्कि उन्हें शिक्षा, नेतृत्व और सामाजिक बंधनों से मुक्ति का अवसर भी प्रदान किया। निष्कर्षतः, यह शोध स्पष्ट करता है कि कतिपय लैंगिक विषमताओं और कठोर अनुशासनिक नियमों के बावजूद, प्राचीन भारत में ये संघ महिला सशक्तिकरण के प्रथम संस्थागत प्रयास थे, जिन्होंने भारतीय संस्कृति और धार्मिक इतिहास पर अमिट छाप छोड़ी।

Keywords:

भिक्षुणी संघ, आर्यिका संघ, श्रमण परंपरा, विनय, थेरिगाथा, प्राचीन भारत, महिला सशक्तिकरण

Author Biography

Dr. Kirti Kumari, Department of History, Ph.D From Malwanchal University, Indore, M.P, India.

Email - kmkirtis98@gmail.com

 

 

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