[36] नैमिषारण्य की अरण्य संस्कृति और सतत पर्यटन: एक समाहार

How to Cite the Article: प्रियंका भारती & सुनील कुमार निरंजन (2026). नैमिषारण्य की अरण्य संस्कृति और सतत पर्यटन: एक समाहार. International Journal of Multidisciplinary Research & Reviews. 5(4), 425-435. https://doi.org/10.56815/ijmrr.v5i4.2026.425-435

Authors

  • प्रियंका भारती, डॉ0 सुनील कुमार निरंजन

Icon

https://doi.org/10.56815/ijmrr.v5i4.2026.425-435

Abstract

विकसित भारत@2047 के वर्तमान संदर्भ में पर्यटन विकास केवल ईंट-पत्थर के निर्माण को ही व्याख्यायित करती हुई नहीं होनी चाहिए बल्कि इसका उद्देश्य क्षेत्रीय विविधता के संरक्षण व संवर्द्धन में निहित होना आवश्यक है| इसी परिप्रेक्ष्य में यदि हम तपोस्थली नैमिषारण्य के पर्यटन विकास की स्थिति-प्रस्थिति की चर्चा करें तो यहाँ के भविष्य की राह इसकी ‘अरण्य संस्कृति’ को पुनर्जीवित करने में ही फलित होती दृष्टिगोचर होती है| प्रस्तुत शोध पत्र का उद्देश्य नैमिषारण्य के वर्तमान पर्यटन विकास की दिशा और दशा के समीक्षा करने के साथ-ही इस प्रश्न का समुचित उत्तर तलाश करने में निहित है कि आखिरकार कैसे नैमिषारण्य की शान्ति और सात्विकता को बनाये रखते हुए प्राकृतिक पूंजी व आधुनिक और पौराणिक विरासतों का संरक्षण किया जाए जिससे आने वाले समय में यह परिक्षेत्र विश्व के सबसे महत्वपूर्ण ‘कोग्नीटिव टूरिज्म’ का केंद्र बने और निरंतरता के साथ देशी-विदेशी पर्यटक यहाँ ज्ञान और शान्ति की तलाश में आयें| इस दृष्टि से प्रस्तुत शोध-पत्र नैमिषारण्य जैसे पवित्र भूमि के ‘वन’ आधारित आध्यात्मिक ढाँचे, ऋषियों के पारिस्थितिकी प्रेम और वर्तमान पर्यटन विकास के मध्य सामंजस्य स्थापित करने के तरीकों का विश्लेषण करता है| 


Keywords:

नैमिषारण्य, अरण्य संस्कृति, प्राकृतिक पूंजी का संरक्षण, विरासतों का संरक्षण, सतत पर्यटन, पर्यावरण संरक्षण, इको-टूरिज्म.

Downloads