[37] धार्मिक परिवर्तन और सामाजिक संबंधों का पुनर्संरचना: नव बौद्ध दलितों के वैवाहिक एवं सामुदायिक व्यवहार का अध्ययन
How to Cite the Article: विनय शील & प्रो० विश्िनाथ मिश्रा (2026). धार्मिक परिवर्तन और सामाजिक संबंधों का पुनर्संरचना: नव बौद्ध दलितों के वैवाहिक एवं सामुदायिक व्यवहार का अध्ययन. International Journal of Multidisciplinary Research & Reviews. 5(4). 436-456. https://doi.org/10.56815/ijmrr.v5i4.2026.436-456
Abstract
यह शोध-पत्र भारत में दलितों के धार्मिक परिवर्तन, विशेषतः डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा प्रेरित नव-बौद्ध आंदोलन, के संदर्भ में वैवाहिक और सामुदायिक संबंधों की पुनर्संरचना का समाजशास्त्रीय अध्ययन प्रस्तुत करता है। अध्ययन का मुख्य उद्देश्य यह समझना है कि हिंदू जाति-व्यवस्था से वैचारिक और धार्मिक विच्छेद के रूप में बौद्ध धर्म ग्रहण करने से दलित समुदायों के विवाह, रिश्तेदारी, सामुदायिक एकजुटता, लैंगिक भूमिकाओं और सांस्कृतिक प्रतीकों में किस प्रकार परिवर्तन आया। शोध की पद्धति गुणात्मक-व्याख्यात्मक है, जिसमें ऐतिहासिक ग्रंथों, एथ्नोग्राफिक अध्ययनों, जीवन-कथाओं, नीतिगत दस्तावेजों और प्रकाशित शोध-सामग्री का थीमैटिक विश्लेषण किया गया है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि नव-बौद्ध धर्मांतरण केवल धार्मिक पहचान का परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह अपमानजनक जाति-नियत सामाजिक संबंधों के विरुद्ध सम्मान, समानता और सामूहिक गरिमा पर आधारित वैकल्पिक सामाजिकता के निर्माण का प्रयास है। तथापि, विवाह-संबंधों, पारिवारिक पितृसत्ता, जाति-चिह्नित रिश्तेदारी और राज्य की आरक्षण-व्यवस्था जैसी संस्थागत शक्तियाँ इस परिवर्तन को आंशिक और जटिल बनाती हैं। निष्कर्षतः, नव-बौद्ध दलितों के बीच सामाजिक संबंधों का पुनर्गठन एक रैखिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि प्रतिरोध, अनुकूलन और पुनर्संयोजन की बहुस्तरीय प्रक्रिया है।













