मीरा ! दि ग्रेट वॉरियर ऑफ राजपूताना/ मीरा ! एक प्रेम योद्धा
How to Cite the Article: Sushma Yadav (2026). मीरा ! दि ग्रेट वॉरियर ऑफ राजपूताना/ मीरा ! एक प्रेम योद्धा. International Journal of Multidisciplinary Research & Reviews, 5(5),365-381
Abstract
भारतीय इतिहास का जब हम आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक विभिन्न आयामों पर नजर दौड़ाते हैं तो हमें अनेक परिवर्तन व बदवलाव दिखाई पड़ते हैं समय-समय पर । इन बदलावों में तमाम ऐतिहासिक घटनाएं होती हैं तमाम चरित्र होतें हैं । 6वीं शताब्दी से लेकर 12 वीं शताब्दी तक एवं 12वीं शताब्दी से लेकर 17वीं शताब्दी तक का भारतीय इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण मान जाता है इस समयावधि में भारत में एक लहर दौड़ी जन्मी वह लहर थी भक्ति की । विशेषकर उत्तरी भारत के सन्दर्भ में देंखे गर तो लगभग-लगभग 12वीं शताब्दी से लेकर 17वीं शताब्दी तक की समयावधि केवल भक्ति एक सामान्य लोगों के जीवन तक या कह लीजिए व्यक्तिगतसत्ता तक ही सीमित नहीं रह गयी थी। यह एक सामाजिक, धार्मिक आन्दोलन के रूप में परिवर्तित हो गया था । क्योंकि यह भक्ति सिर्फ पारलौकिकता तक भर की बात नहीं रह गयी थी बल्कि इसके घेरे में आने वाले संतकवि अब जिरह कर रहे थे, संवाद कायम कर रहे थे न सिर्फ ईश्वर से बल्कि अपने आसपास की समाजसत्ता से, राजनीतिक सत्ता से, धार्मिकसत्ता से और अर्थसत्ता से । यह भारतीय इतिहास या भक्ति आंदोलन की कमी रही है उनके जानने वाले , या हम सबकी भी । कि जैसे ही भक्ति आन्दोलन या संत शब्द सुनाई दिखाई पड़ता है तो पहले-पहल हमारे मन-मस्तिष्क में एक पुरुष छवि आकार ले लेती। साधना, आराधना, उपासना, पारलौकिकता, ज्ञानी, प्रेमी, ध्यानी जैसे शब्दों के जुबान पर आते ही मस्तिष्क में एक पुरुष छवि ही कौंधती है, और हमारे दिलो-दिमाग में कबीर, रैदास, सूर, तुलसी, दादू, नानक आदि पुरुष संतकवि छा जातें हैं । इसका परिणाम यह होता है कि इस भक्ति आन्दोलन की धारा में इस लहर में आने वाली महिला संतकवि कहीं बहुत-बहुत दूर पीछे छूट जातीं हैं। चाहे मीरा हों, लल्लावेद हों या अणडाल, राबिया, सहजोबाई, दयाबाई और अनेक महिला संतकवि । ये महिला संत कवि भी अपने समाज से, घर-परिवार, सम्बंधों रिश्तों से उसी प्रकार विद्रोह करके अपनी एक अलग राह स्थापित की थी जैसे पुरुष संतकवि। इन महिला संतकवियों को पुरुष संतकवियों से कहीं अधिक इनके सामने समाज की, घर-परिवार की, परम्पराओं की, लोक-लाज-मर्यादा की बेड़ियां थी इनके पैरों में फिर भी उन्होंने उन सारे ऊपरी बातों और दिखावे के जीवन को समाज द्वारा निर्मित सामाजिक ढांचे को तोड़कर, छोड़कर अपने आपको स्वतंत्र करके अपने निज को पहचाना था । इन्हीं महिला संतकवि में एक योद्धा थी मीरा । जिसे हर कोई जानता है, पहचानता है उनकी कृष्ण भक्ति की लिए प्रेम के लिए। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह भक्ति केवल परालौकिक भक्ति महज कृष्ण भक्ति भर ही थी या कहीं इससे अधिक उस व्यवस्था के प्रति विद्रोह था जिसने महिलाओं के जीवन को केवल चारदीवारों में कैद करके रखा दिया जिसने महिला के जीवन को पुरुष के आधीन करके रख छोड़ा था । क्या यह भक्ति यह प्रेम कर पाना मीरा के लिए इतना सरल सहज रास्ता था। जिस पर चलकर उन्होंने यह प्रसिद्ध पाई या यह अमरता हासिल की कि मीरा अपने प्रेम और प्रेमी कृष्ण को पा सकी । दूसरा यह क्या मीरा महज एक आसमानों में कहीं दूर बसने वाले परमात्मा की पुजारन ही मात्र थी या कहीं इससे अधिक चुनौती देने वाली एक योद्धा उस समाज की जो समाज महिला को केवल अबला लाचार मनोरंजन का साधन और देहभर समझता था समझता है इस लेख में मीरा के इसी योद्धा रूप का उनके व्यक्तित्व को समझने का और सामने लाने का एक प्रयास किया गया है ।













