IJMRR - International Journal of Multidisciplinary Research & Reviews
Int. J. Multidiscip. Res. Rev.
DOI Prefix: 10.56815
I J M R R
Int. J. Multidiscip. Res. Rev.

International Journal of Multidisciplinary Research & Reviews

Peer Reviewed | UGC Compliant | High Impact Factor | Scientific Journal

ISSN: 2945-3135 | High Scientific Impact | UGC-CARE Followed
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DOI DOI Prefix: 10.56815
Vol. 5 (2026) No. 1: January (2026)

[ पेपर आई.डी. : 58316 ] औपनिवेशिक काल के दौरान भारतीय कृषि और पारंपरिक उद्योगों का पतन: एक ऐतिहासिक विश्लेषण

Preeti Kumari*

यह शोध पत्र ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के अधीन भारतीय अर्थव्यवस्था के दो प्रमुख स्तंभों कृषि और पारंपरिक हस्तशिल्प के ह्रास की प्रक्रिया और उसके कारणों का समालोचनात्मक विश्लेषण करता है शोध का मुख्य केंद्र बिंदु यह पड़ताल करना है कि किस प्रकार ईस्ट इंडिया कंपनी और तत्पश्चात ब्रिटिश क्राउन की आर्थिक नीतियों ने भारत की सदियों पुरानी आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक 'औपनिवेशिक उपभोज्य अर्थव्यवस्था'  में परिवर्तित कर दिया। कृषि के संदर्भ में, यह पत्र नई भू-राजस्व प्रणालियों (जैसे स्थायी बंदोबस्त और रैयतवारी) और कृषि के जबरन वाणिज्यिकरण के दुष्प्रभावों को रेखांकित करता है, जिसने कृषकों को ऋणग्रस्तता और अकाल की ओर धकेला। दूसरी ओर, पारंपरिक उद्योगों के क्षेत्र में, यह शोध 'वि-औद्योगिकीकरण' की प्रक्रिया का परीक्षण करता है, जहाँ ब्रिटिश मशीनी उत्पादों की प्रतिस्पर्धा और विभेदात्मक टैरिफ नीतियों ने भारतीय वस्त्र और धातु उद्योगों को नष्ट कर दिया अध्ययन के निष्कर्ष दर्शाते हैं कि कृषि और उद्योगों का यह पतन केवल आर्थिक परिवर्तन नहीं था, बल्कि एक सुनियोजित 'धन का निष्कासन' था, जिसने भारतीय सामाजिक-आर्थिक ढांचे में संरचनात्मक विकृतियाँ पैदा कीं  यह शोध प्राथमिक और माध्यमिक ऐतिहासिक स्रोतों के आधार पर यह तर्क प्रस्तुत करता है कि औपनिवेशिक नीतियों ने आधुनिक भारतीय आर्थिक पिछड़ेपन की नींव रखी।

Keywords:
औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था वि-औद्योगिकीकरण भू-राजस्व कृषि का वाणिज्यिकरण धन का निष्कासन ब्रिटिश राज।