नेहरू युग में गुटनिरपेक्ष आंदोलन की विदेश नीति: सिद्धांत और व्यवहार का विश्लेषण
यह शोध पत्र स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल (1947–1964) के दौरान भारत की गुटनिरपेक्षता (Non-Alignment) की नीति का एक गहन और आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात जब संपूर्ण विश्व वैचारिक आधार पर दो सैन्य गुटों (अमेरिकी नेतृत्व वाला नाटो और सोवियत संघ का वारसा पैक्ट) में विभाजित था, तब नेहरू ने भारत के लिए मध्य मार्ग का चयन किया।
इस शोध का मुख्य केंद्र बिंदु सिद्धांत और व्यवहार के बीच के द्वंद्व को समझना है। सैद्धांतिक स्तर पर, यह नीति ‘पंचशील’ के आदर्शों, संप्रभुता के सम्मान और उपनिवेशवाद के विरोध पर आधारित थी। वहीं, व्यावहारिक स्तर पर कोरियाई युद्ध, स्वेज नहर संकट और विशेष रूप से 1962 के भारत-चीन युद्ध जैसी घटनाओं ने इस नीति की प्रभावशीलता और सीमाओं का परीक्षण किया।
अनुसंधान यह निष्कर्ष निकालता है कि नेहरू युग में गुटनिरपेक्षता केवल एक तटस्थता की नीति नहीं थी, बल्कि यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) को बनाए रखने का एक सक्रिय प्रयास था। यद्यपि 1962 के संघर्ष ने इसके कुछ आदर्शवादी पहलुओं पर प्रश्नचिह्न लगाए, किंतु इस नीति ने वैश्विक दक्षिण (Global South) के देशों को एक नई पहचान दी और शीत युद्ध के तनाव को कम करने में एक नैतिक बल के रूप में कार्य किया।