IJMRR - International Journal of Multidisciplinary Research & Reviews
Int. J. Multidiscip. Res. Rev.
DOI Prefix: 10.56815
I J M R R
Int. J. Multidiscip. Res. Rev.

International Journal of Multidisciplinary Research & Reviews

Peer Reviewed | UGC Compliant | High Impact Factor | Scientific Journal

ISSN: 2945-3135 | High Scientific Impact | UGC-CARE Followed
IJMRR - International Journal of Multidisciplinary Research & Reviews

International Journal of Multidisciplinary Research & Reviews

DOI DOI Prefix: 10.56815
Vol. 5 (2026) No. 8: August (2026)

संतों की साधना में शिवशक्ति ऊर्जा का महत्व

डॉ. सुषमा यादव (Dr. Sushma Yadav)

-संसार का कोई भी पुरुष मात्र पुरुष भर नहीं होता, न ही स्त्री मात्र स्त्री भर । दोनों ही स्त्री और पुरुष ऊर्जा का सम्मिलित रूप है । एक पुरुष जब सिर्फ अपनी पुरुष ऊर्जा को ही आधार मानकर उसको ऊपर उठाकर जीवन‌ जीना शुरू कर देता है तो दुनिया में पुरुष उर्जा और अधिक बढ़ जाती है । नतीजन, दुनिया में युद्ध, तनाव, संघर्ष, जैसी ऊर्जा का बढ़ जाना, परिस्थिति उत्पन्न हो जाना । पुरुष ऊर्जा यानी ( मैस्क्युलिन इनर्जी ) संकेत ( indicate ) करती है चेतना को, 3D वर्ड को यानी भौतिक दुनिया ( materialistic world) को । जबकि स्त्री ऊर्जा ( फैमिनाइन इनर्जी ) यानी स्त्री ऊर्जा दर्शाती है पोषण को, सक्रिय भावना को, ‌प्रेम को, समर्पण को और सहज बुद्धि या अन्य: प्रज्ञा को ( Intuition Power) को, अध्यात्मिक दुनिया को यानी 5D world को । मानव शरीर ऊर्जा का सम्मिलित रूप है । ये तरंगें निरंतन उठती रहती है मनुष्य के मूलाधार से लेकर सहस्त्रात तक । मनुष्य के कार्य उसके विचार उसकी भावनाएं उसका दैंनदिन की क्रियाएं इन्हीं चक्रों पर आधारित होती है । कौन सा चक्र शरीर में कितना जाग्रत और कितना संतुलित अवस्था में है ये मनुष्य के कार्यकलापों उसके विचारों से पता चलता है । जैसे कृष्ण ने अपनी गीता में मनुष्य के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का आधार गुणों को माना है, जिसमें सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण आतें हैं । इसी को उर्जा के रूप में 7 चक्रों की उर्जा से जाना जाता है जोकि स्त्री और पुरुष को पूर्ण बनाते हैं । यह कोई नयी कहानी या सिद्धांत नहीं बल्कि भारतीय दर्शन का सबसे प्राचीन और मनुष्य की होने को निशानी है । पुरुष और स्त्री ऊर्जा के मिलन बिंदु को ही, इन दोनों ऊर्जाओं के साथ-साथ होने को मनुष्य के भीतर ही भारतीय दर्शन में अर्द्धनारीश्वर रुप भी कहा गया है । जो हर मनुष्य चाहे स्त्री हो या कि पुरुष दोनों में चैतन्य रूप से व्याप्त है ‌। जरुरत है तो मात्र उसको पहचानने की । इसी अर्धनारीश्वर रूप को या इन दो ऊर्जाओं को भक्ति संत अपने जीवन में कैसे जगा रहे थे ? कैसे इसको अपने अस्तित्व में उतार कर अपने दैनंदिन जीवन की गतिविधियों से दो-चार हो रहे थे । अपने जीवन को परमात्मा के प्रति समर्पण कर अपने व्यावहारिक जगत और आध्यात्मिक जगत को धन्य बना रहे थे उसमें संतुलन स्थापित कर रहे थे इसी पर आधारित है यह सम्पूर्ण लेख।

Keywords:
स्त्री और पुरुष ऊर्जा कुंडलिनी जागरण अर्धनारीश्वर रूप सात दिव्य ऊर्जा चक्र नाथ सम्प्रदाय प्रणामी सम्प्रदाय कबीर दादू प्राणनाथ आध्यात्मिक जागरण मूलाधार चक्र(Root Chakra) स्वाधिष्ठान चक्र(Sacral Chakra) मणिपुर चक्र( Solar Plexus Chakra) अनाहत चक्र(Heart Chalra) विशुद्धि चक्र(Throat Chakra) अंजना चक्र(Third Eye Chakra) सहस्त्रार चक्र(Crown Chakra) सतोगुण रजोगुण तमोगुण शिवशक्ति ।