[23] प्रेमचंद के कथा साहित्य में कृषक जीवन और नवजागरण के सूत्र
How to Cite the Article: पंकज कुमार चौधरी & ज्योति किरण हिन्दी विभाग (2026). प्रेमचंद के कथा साहित्य में कृषक जीवन और नवजागरण के सूत्र. International Journal of Multidisciplinary Research & Reviews, 5(7),328-334. https://doi.org/10.56815/ijmrr.v5i7.2026.328-334
Abstract
किसान अन्नदाता हैं, किसान जीवन दाता हैं, यह जितना पहले सच था आज आधुनिक समय में भी उतना ही सच है। प्रेमचंद के समय में किसानों का जीवन अभावों, संघर्षों से भरा था। जीवन संघर्ष और तप का पर्याय था। सीमित संसाधन और असीम संघर्ष। साहूकारों और जमींदारों के शोषण से किसानों का जीवन त्रासदी का मार्मिक गाथा बन गया था। संघर्षो से लथ-पथ जिंदगी में भी सरलता, सहजता और सादगी से कृषक अपने जीवन के साथ-साथ सभी के जीवन में कुछ रस घोल देते थे। धरती के पुत्र धरती के समान धैर्य रखकर अन्न उगाते रहे, सभ्यता पलती रही, संस्कृति सँवरती रही। कृषक जीवन के सभी पहलुओं पर प्रेमचंद ने संवेदनशीलता से प्रकाश डाला है। जमींदार और साहूकारों से संघर्ष करते-करते किसान प्रकृति के कोप से भी धरती की कोख को बचाते रहे। इस संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य भी है कि प्रेमचंद की कहानियों में कृषक जीवन की समस्याएँ ही नहीं बल्कि शोषण के खिलाफ उभर रही, उबल रही चेतना ध्यान आकर्षित करती है। हर कहानी में यथास्थिति के खिलाफ कोई न कोई पात्र मुठभेड़ करता है। हर कहानी में क्रांति की एक आत्मीय सुगबुगाहट है। प्रेमचंद ने कृषक-जीवन से जुड़ी कहानियों में भारतीय किसान के जीवन संघर्ष, समस्याओं के साथ सामाजिक इकाई के रूप में उभर रही चेतना को भी रेखांकित किया। प्रेमचंद की कहानियाँ केवल दुःख और दर्द की दास्ताँ नहीं है बल्कि कृषक जीवन के हक और हकीकत के लिए जाग रही चेतना की आवाज़ भी है। यह नवजागरण का मूल तत्व है।













